Friday, September 25, 2009

सादगी और विनम्रता की मूर्ति

एक बड़े आदमी की नजर में उसके ड्राइवर या उसके रसोइया का क्या वजूद है ? अमूमन आज के भौतिकवादी युग में जहां मानवीय संवेदनांए मर गई हो, एक अदना सा ड्राइवर का वजूद किसी बड़े नेता की निगाह में एक हाड़-मांस के कामगार से ज्यादा कुछ नहीं। लेकिन वो इंसान अगर राहुल गांधी हो तो बात कुछ और ही होती है।

राहुल गांधी गुरुवार को जब लखनऊ से दिल्ली वापस आ रहे थे तो उन्होने अपने कार के ड्राईवर से हाथ मिलाया और उसे धन्यवाद दिया। राहुल गांधी की ये विनम्रता एक आम आदमी के प्रति उनके सरोकारों को दिखाती है। एक ऐसे दौर में जब सियासतदान खुद को किसी राजा-महराजा से कम नहीं समझते हों, राहुल गांधी का अपने ड्राइवर से हाथ मिलाना एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। कांग्रेस महासचिव ने ऐसा करके अहंकार और अकड़ में जीते उन नेताओं को एक संदेश दिया है कि उनकी प्रसांगिकता जनता की सेवा करने तक ही है और इसकी पहली शर्त विनम्रता और सादगी होनी चाहिए।

हाल के दिनों में सरकारी हलकों में सादगी की बातें बड़े जोर-शोर से उठाई जा रही है लेकिन राहुल गांधी इसे चुपचाप और बिना किसी शोरशराबे के करने में यकीन रखते हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी दिल्ली से लखनऊ फिर वापसी के वक्त लखनऊ से दिल्ली इकनामी क्लास में आए लेकिन उन्होने इसे किसी भी तरह के प्रचार से दूर रखा।

राहुल गांधी का ये जीवन दर्शन महात्मा गांधी के उस सिद्धांत से बिल्कुल मेल खाता है जो उन्होने अपने प्रिय गीत ‘ वैष्णवजन तो तेने कहिए...के द्वारा बार-बार दुहराया था। देश के शिखर राजनीतिक परिवार और मुल्क की कमान संभाल रहे सबसे बड़े राजनीतिक दल से ताल्लुक रखने वाले राहुल गांधी इस बात को कभी नहीं भूलते कि राजनेताओं का पहला और आखिरी कर्तव्य आमजनता की सेवा होनी चाहिए। शायद कुछ चीजें विरासत से ही मिलती हैं जो संचित अनुभव के रुप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रही है।

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