Wednesday, November 11, 2009

औद्योगिकीकरण हो, लेकिन आम आदमी की कीमत पर नहीं

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी देश और दुनिया की अहम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। चाहे वो मसला जंगल से जुड़ा हो या आदिवासियों से। आदिवासी मुद्दों, औद्योगिकीकरण और खनिजों की खुदाई जैसे मुद्दों पर उनकी एक स्पष्ट सोच है जो कांग्रेस के आमआदमी के नारे के बिल्कुल अनुरुप है। तकरीबन साल भर पहले एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होने कहा था कि वे औद्योंकिकरण और माईनिंग के खिलाफ नहीं है लेकिन ऐसा करते समय ये देखा जाना चाहिए कि आमआदमी का हित प्रभावित न हो। उन्होने कहा, ‘मैं औद्योगिकीकरण के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मैं ऐसी जगहों पर खनिजों की खुदाई के बिल्कुल खिलाफ हूं जो लोगों की जिंदगी को प्रभावित करे। अगर खुदाई से लोगों की संस्कृति, उनकी जीवनशैली, वहां का पर्यापरण और पीने के पानी की आपूर्ति वाधित होती है तो ऐसा नहीं होना चाहिए। उनकी खेती, उनका शिकार और उनके द्वारा जंगल से फल और लकड़िया इकट्ठा करना प्रभावित नहीं होना चाहिए। ये मेरा निजी विचार है’।

उनका मानना है कि देश के कई सूबों में खनिजों की भरमार है लेकिन लोग गरीब हैं। वहां की सरकार के पास भी पैसे की कोई कमी नहीं है लेकिन लोगों के पास तरक्की का फायदा नहीं पहुंच पा रहा। सूबों में कई कल कारखाने भी हैं और सरकारों के पास पैसे की भी कमी नहीं है। कल कारखानों के विकास में इन आदिवासियों और दलितों का खून पसीना लगा है लेकिन अभी तक उन्हे इसका उचित हिस्सा नहीं मिल पाया है। उनका ये भी मानना है कि अगर सूबों का सही तरीके से विकास करना है तो इन कारखानों और उद्योगों को सामने आना होगा और लोगों का हाथ थामना होगा। उनकी तरक्की में हाथ बंटाना होगा।
जाहिर है, कांग्रेस महासचिव की सोच, पार्टी के उसी सिद्धांत का एक हिस्सा है जो वकालत करती है कि देश में विकास का एक समन्वयकारी माडेल तैयार किया जाए। जहां सभीलोगों को तरक्की करने का बराबर मौका मिले।

कमजोरों का हाथ थामे सरकार

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का मानना है कि विकास और गरीबों के हित के बीच एक तालमेल होनी ही चाहिए। उनका साफ मानना है कि विकास की योजनाओं से सबसे ज्यादा अगर कोई प्रभावित होता है तो वो गरीब है-इसलिए हमारी चिंता का केंद्र गरीब होना चाहिए। अगर सरकारें समझादारी से काम ले तो इस संतुलन को कायम किया जा सकता है। लेकिन कई जगह जब ऐसा नहीं होता है तो सिंगूर और नंदीग्राम जैसे हालात पनपते हैं। वे आगाह करते हैं कि आनेवाले दिनों में अगर इस बात का ख्याल नहीं रखा गया तो ये समस्याएं और भी सामने आएंगी क्योंकि उसी अनुपात में विकास कार्यों से प्रभावित होनेवाले लोगों की तादाद भी बढ़ेगी।

उनका साफ मानना है कि अगर कोई सरकार संवेदनशील है तो वह ऐसी हालत में आगे बढ़कर गरीबों का हाथ थामेगी और उनके लिए उचित उपाय करेगी। अपने उड़ीसा दौरे का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि ऐसे ही एक गांव में उन्होने एक ही जैसे छोटे-छोटे पक्के मकान देखे और लोगों से पूछा कि ये क्या है। लोगों ने कहा कि पहले वे वहां से 30-40 किलोमीटर दूर रहते थे लेकिन अब उद्योंगों और खुदाई की वजह से उन्हे वहां से हटाकर ये मकान आवंटित कर दिए गए हैं। वहां न तो कोई बिजली का इंतजाम था न ही कोई स्कूल था। कहने का मतलब ये कि ये वो लोग थे जो विकास की गतिविधियों से प्रभावित हुए थे। इसे रोकना ही होगा, नहीं तो असंतोष को रोका नहीं जा सकता।

जाहिर है, ये एक ऐसे नेता की सोच है तो विचार और व्यवहार से इंसानियतपसंद है। जो व्यावहारिक बातें करता है और भविष्य की सोच रखता है।

नक्सलिज्म को रोकने के लिए सरकारों को जनता तक जाना होगा

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का मानना है कि नक्सलिज्म सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। बल्कि ये सरकारी योजनाओं का जनता तक सही तरीके से न पहुंच पाने और भ्रष्टाचार का मामला है। एक प्रेसवार्ता में उन्होने स्पष्ट कहा कि, ‘नक्सलिज्म को दो तरीकों से देखा जाना चाहिए। इसके दो पहलू है। एक जैसा मैने पहले भी दुहराया है-कुछ राज्यों में वहां की सरकार आम जनता तक नहीं पहुंच पा रही है और उनकी समस्या को नहीं सुन रही है। दूसरा ये कि चूंकि सरकार जनता की बात नहीं सुन रही है, यह एक कानून-व्यवस्था का मसला बनता जा रहा है। तो अगर आप मेरी राय में नक्सलिज्म की व्याख्या सुनना चाहते हैं तो हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी योजनाएं जनता तक सही तरीके से पहुंचे और उन्हे इसका फायदा हो। जिस दिन ऐसा होने लगेगा, नक्सलिज्म अपने आप खत्म हो जाएगा’।

आमलोगों से मिलने की उनकी मुहिम सियासतदानों के लिए एक नजीर है....

राहुल गांधी देश की जनता का नब्ज जानना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों से वे मिलें और उनकी समस्याएं समझें। अपने कई दौरों में राहुल गांधी ने इसके लिए आदिवासी युवाओं से बंद कमरे में मुलाकात की और उनकी तकलीफें सुनीं। अपने हालिया झारखंड दौरे में उन्होने साहिबगंज में सैकड़ों आदिवासी युवाओं से बात की और उनकी समस्याओं और आकांक्षाओं को जानने की कोशिश की। उन्होने संथालपरगना का इतिहास, आदिवासी आंदोलन, आजादी की लड़ाई में उनके बलिदान और उनके भविष्य के बारे में उनसे गहन चर्चा की। वे आदिवासी संस्कृति को जानना चाहते हैं और कई बार कह चुके हैं कि ऐसा इसलिए जरुरी है कि अलग-अलग जगह के हालातों के अनुरुप योजनाएं बनाई जा सकें।

कांग्रेस महासचिव का ये प्रयास आज के सियासतदानों के लिए एक नजीर है। वे मानते हैं कि आमलोगों की सरकार तभी सही तरीके से काम कर पाएगी जब वो अलग-अलग संस्कृति के लोगों की समस्याओं को सही तरीके से हल करने की कोशिश करेगी।


आदिवासियों, दलितों की नुमांइदगी पर यूथ कांग्रेस का खास जोर

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का ये मानना है कि देश की तरक्की तब तक नहीं हो सकती जब तक समाज के कमजोर तबकों को उचित मौका नहीं मिलता। एक सवाल के जवाब में उन्होने कहा था कि उनका संगठन यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई- जिसके कि वे प्रभारी है- ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ रहा है जिसमें आदिवासी और दूसरे कमजोर तबकों को ज्यादा से ज्यादा नुमांइदगी हासिल हो। यूथ कांग्रेस में आदिवासियों और दलितों के लिए जरुरी तादाद में सीटें रिजर्व हैं और उनकी यहां उनकी नुमांईदगी खासतौर से सुनिश्चित की गई है। उनकी अवहेलना यहां विल्कुल मुमकिन नहीं है। कई जगह तो ऐसा भी हुआ है जहां संगठन के चुनावों में आदिवासियों ने बड़ी तादाद में सीटें हासिल की है। इससे कई दफा दूसरे तबके के लोगों को ताज्जुब भी होता है, लेकिन यूथ कांग्रेस का ढ़ांचा इस हिसाब से तैयार किया गया है कि ये कमजोर तबकों के प्रति थोड़ा सा पक्षपाती है। यह एक तरह से सकारात्मक पक्षपात है।


हजारों सालों से जंगलों में रहने वाले पर्यावरण के दुश्मन नहीं

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का मानना है कि जो लोग हजारों सालों से जंगलों में रहते हैं वे जंगल के दुश्मन कैसे हो सकते हैं। उनका मानना है कि आदिवासी जंगल और पर्यावरण के असली दोस्त है। ये कहना कि उनकी जीवनशैली जंगल को नुक्सान पहुंचा रही है, बिल्कुल गलत है। उनका ये भी मानना है कि समाज का एक तबका पर्यावरण को बचाने और उसे संवर्द्धित करने में आदिवासियों के पीढ़ियों के ज्ञान और अनुभव को नजरअंदाज कर रहा है। अगर हम ऐसा करते रहे तो हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। उनका साफ मानना है कि आदिवासियों का हजारों साल का संचित अनुभव हमें पर्यावरण को बचाने में बड़ी मदद कर सकता है।

जब यूपीए सरकार ने संसद में जंगल अधिकार कानून पास किया तो कांग्रेस महासचिव और पार्टी की यहीं सोच झलक कर सामने आई। वे बहुत दिनों से इसकी वकालत करते रहे हैं। आखिरकार सरकार ने ये कानून बनाकर जंगल में रहनेवाले समुदायों का उनके जंगल की संपदा पर कुदरती अधिकार को कानूनी मान्यता दे दी।

फिरोजाबाद में कांग्रेस ‘राज’

कांग्रेस ने फिरोजाबाद उपचुनाव जीत लिया है। इसने ये सीट समाजवादी से छीना है। कांग्रेस उम्मीदवार राजबब्बर ने यहां सपा उम्मीदवार और मुलायम सिंह की बहू डिम्पल यादव को 85,000 से ज्यादा वोटों से मात दी। फिरोजबाद वो इकलौती सीट है जहां कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने इन उपचुनावों में प्रचार का काम किया था।
गौरतलब है कि फिरोजाबाद सीट मुलायम सिंह का मजबूत किला माना जाता है और यहां पिछले आमचुनाव में मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव ने जीत दर्ज की थी, लेकिन दो जगहों से चुनाव जीतने की वजह से उन्होने फिरोजाबाद सीट से इस्तीफा दे दिया था।

पूरे देश से मिल रहे उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस और इसके सहयोगी दलों ने इन उपचुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है। पिछले 7 नवंबर को लोकसभा की 1 और विधानसभाओं की 31 सीटों के लिए चुनाव हुए थे जिसमें कांग्रेस और इसके सहयोगी दलों ने 17 विधानसभा सोटों पर और इकलौती लोकसभा सीट फिरोजाबाद पर जीत का परचम लहराया।

कांग्रेस ने यूपी में 1, हिमाचल में 1, राजस्थान में 1, छत्तीसगढ़ में 1, केरल में तीन की 3, और अपने सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल में 10 में से 8 सीटों पर जीत दर्ज किया। इसके आलावा पार्टी ने लोकसभा की एकमात्र सीट फिरोजाबाद के लिए हुए उपचुनाव में भी जीत दर्ज की।

Tuesday, November 3, 2009

इंदिरा गांधीः एक मूल्यांकन

पिछले 31 अकटूबर को पूरे देश में इंदिरा गांधी का 25वां शहीदी दिवस मनाया गया और अब माकूल वक्त आ गया है कि हम इंदिरा गांधी का इस देश के प्रति योगदान पर चर्चा करें। आजादी के बाद देश को पंडित नेहरु के रुप में एक दूरदर्शी और आधुनिक नेता मिला जिसकी परंपरा इंदिरा गांधी ने बखूबी आगे बढ़ाया।

इंदिराजी के कार्यों का जिक्र करते समय अक्सर लोग उनके कुछ बड़े कामों जैसे बैंकों, खानों और तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रवीपर्स का उन्मूलन, उनकी ’71 के चुनाव में भारी जीत और गरीबी हटाओ के आह्वान को गिना देते है-लेकिन वाकई इंदिराजी इस सबसे बढ़कर बहुत कुछ थी जिसे यह देश सदियों तक याद रखेगा।

चुनाव सन् 71 के जनवरी हुए थे और उसी साल दिसंबर में इंदिराजी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को लड़ाई में करारी मात दी। बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में पूरी दुनिया के सामने आया। लेकिन इंदिराजी का जो सबसे साहसिक कदम था वो ये कि उन्होने भारत को पहली बार परमाणु शक्ति संपन्न देश की श्रेणी में ला खड़ा किया। एक शक्तिशाली और उदीयमान भारत की धमक दुनिया को सुनाई पड़ने लगी। उनकी ये एक ऐसी उपलब्धि है जिसे उनके विरोधी खासकर बीजेपी के लोग भी मानते हैं। बांग्लादेश मुक्ति के वक्त ये अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिन्होने इंदिराजी को दुर्गा तक कहा था।

इस देश की कई पीढियां इंदिराजी को लेकर अगर नोस्टेल्जिक हैं तो इसकी वजह है। इंदारजी शायद आखिरी नेता थी जिनमें पूरा मुल्क अपना अक्श देखता था। शायद उनकी मौत के बाद से पूरा भारतीय लोकतंत्र एक अखिल भारतीय नेता की तलाश में अभी तक भटक रहा है। यूं, एक सवाल ये भी है कि क्या गठबंधन के इस युग में हम अलग दबाव समूहों, अलग-अलग आकांक्षाओं और सतरंगी पार्टियों के हाथ में देश को सौंप कर सुरक्षित महसूस कर रहे हैं या फिर हमें अभी भी पूरे देश को अपने व्यक्तित्व में समाहित करने वाली एक शख्सियत की तलाश है भले ही उसमें अतिरंजित सत्ता का ही खतरा क्यों न हो। शायद दोनों ही सवाल अहम हैं, और अधूरे भी। लेकिन हिंदुस्तान ने इंदिराजी की शक्ल में एक ऐसा नेता पाया था जो अरसे बाद किसी मुल्क को नसीब होता है।

कुछ राजनीतीक टीकाकारों की राय में इंदिराजी का एक अहम योगदान ये भी था कि 60 से लेकर 80 के दशक तक के उस दौर में उन्होने देश को एक बनाए रखने में सफलता प्राप्त की। खासकर तब जब हमारा पड़ोस अराजकता की वजह से बुरी तरह चरमरा रहा था। पाकिस्तान दो टुकड़ो में बंट चुका था, अफगानिस्तान में सोबियत हस्तक्षेप हो चुका था और श्रीलंका जातीय युद्ध में बुरी तरह उलझा था। ये उस दौर की बातें है जबकि पश्चिम के कई राजनीतिक विश्लेश्कों ने यहां तक दावा कर दिया था कि हिंदुस्तान एक देश के तौर पर ज्यादा दिन तक बजूद नहीं रख पाएगा। उनका कहना था कि या तो देश बिखर जाएगा या फिर सेना यहां की सत्ता पर कब्जा कर लेगी। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, इसे इंदिराजी का बड़ा योगदान माना जा सकता है।

लेकिन इंदिराजी की सबसे बड़ी देन जो है वो विदेशनीति के क्षेत्र में है। उन्होने भारत के चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाकर उस देश को हमेंशा के लिए सुरक्षात्मकर मानसिकता में जीने को मजबूर कर दिया। ये कल्पना करने की बात हो सकती है कि अगर पाकिस्तान आज एक होता तो सीमा के दोनों तरफ से हो रही आतंकी हमलों से हम किस तरह निपटते। कश्मीर जहां अभी तक हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है, इंदिराजी के जमाने में शांत था।

कई लोग आरोप लगाते हैं कि इंदिराजी के दौर में भारत, सोबियत संघ पर कुछ ज्यादा ही निर्भर हो गया। लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो तत्कालीन तेजी से बदलती दुनिया में परिस्थितियों ने ऐसी शक्ल ले ली थी कि भारत के सामने ज्यादा विकल्प नहीं थे। 60 के दशक में ही पाकिस्तान, अमेरिका की गोद में जा चुका था। 70 के दशक में पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका के साथ प्रगाढ़ संबंध बना लिए। 80 के दशक में पाकिस्तान, अफगानिस्तान में सोबियत हस्तक्षेप की वजह से अमेरिका का दुलारा बन चुका था। ऐसी हालत में भारत को सोबियत संघ के साथ दोस्ती करने के अलावा कोई चारा भी नहीं बचा था।

आज पाकिस्तान की अमेरिका पर निर्भरता पूरी दुनिया देख रही है और पाकिस्तान के लिए इसके सुखद परिणाम भी नहीं आए हैं। पाकिस्तान, मलवा में तब्दील होता जा रहा है। शायद हमारी सोबियत संघ से दोस्ती उस हिसाब से बेहतर परिणाम दे गई-हमारी हालत उनसे बहुत अच्छी है।

देश के अंदरुनी हालत की बात की जाए तो देश में हरित क्रान्ति की शुरुआत भले ही लालबहादुर के शासनकाल में हुई थी लेकिन उसे एक मुकम्मल अंजाम तक इंदिराजी के काल में ही पहुंचाया गया। इंदिराजी के शासनकाल में देश ने दो-दो अकाल झेला। जिस वजह से इस योजना में और भी तेजी लाई गई।

राजनीतिक मोर्चे पर इंदिराजी ने महान साहस और धैर्य का परिचय दिया। कांग्रेस के कद्दावर नेताओं-खासकर मोरारजी देसाई, अतुल्य घोष, एस नजिलिंजप्पा, के कामराज सहित कई नेताओं को उन्होने राजनीतिक मैदान में पटखनी दी। इंदिराजी ने अपने शासनकाल में जितना विरोध झेला उतने उनके पिता जवाहरलाल नेहरु ने भी अपने 17 साल के शासनकाल में नहीं झेला। सिर्फ एक बार सन् 62 की लड़ाई में भारत की हार के बाद नेहरु को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा, लेकिन इंदिरा गांधी को तो एक-एक इंच जमीन के लिए लड़ना पड़ा। लेकिन, ये भी उतना ही बड़ा सच है कि हर लड़ाई के बाद वो मजबूत होती गई। दरअसल, वो 1969 के बाद ही मजबूत हो गई थी जब उन्होने प्रिवीपर्स को समाप्त किया था और बैंको का राष्ट्रीय़करण कर दिया था। सन् 71 की लड़ाई में जीत के बाद तो उनका कद देश और विदेशों में भी काफी बढ़ गया।

एक बात और जो इंदिरा गांधी में अहम थी वो ये कि वो उन गिनी चुनी नेताओं में थी जिसकी अपनी एक अखिल भारतीय छवि थी। वो जाति और धर्म से बहुत ऊपर उठ चुकी थी। ये चीज उन्हे पारिवारिक विरासत में मिली थी।

अगर नेहरु परिवार के इतिहास को देखा जाए तो साफ हो जाता है कि खुद मोतीलाल नेहरु, जो गांधीजी से उम्र में बड़े थे, उन्होने आजादी की लड़ाई के लिए अपनी जमी-जमाई वकालत छोड़ दी थी। वे गांधीजी के साथ जा खड़े हुए थे। खुद पंडित नेहरु, बहुत कम उम्र में राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए थे और कई साल तक जेल में भी रहे। नेहरु चाहते तो इन सब चीजों से बच भी सकते थे लेकिन उन्होने वहीं रास्ता अख्तियार किया। नेहरुजी, गांधीजी के बाद देश के सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता साबित हुए-इदिंराजी ने इन सब चीजों को विरासत में पाया था।

जो लोग नेहरु-गांधी परिवार पर वंशवाद का आरोप लगाते हैं वे सही नहीं है। नेहरु-गांधी परिवार का कोई भी सदस्य ऊपर से थोपा नहीं गया था। सभी चुनाव जीतकर आए थे। मोतीलाल नेहरु ’20 के दशक में केंद्रीय एसेंबली के लिए चुने गये थे। नेहरु, इंदिरा,सोनिया और राहुल गांधी सभी चुनाव जीतकर आए हैं। ये सभी एक बड़े वहुमत से चुनाव जीतकर आए हैं इसलिए ये कहना सही नहीं है कि नेहरु-परिवार वंशवाद के तहत देश पर थोपा गया है। दरअसल, य़ह एक अद्भुद खानदान है जिसमें सभी चुनकर आए हैं। यह एक चुना हुआ खानदान है।

अगर देखा जाए तो दुनिया के किसी भी देश में एक ही परिवार की पांच पीढ़िया चुनाव के माध्यम से जीतकर कभी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं रही। इससे साबित होता है कि इस परिवार की अपील पूरे देश में है। नेहरु परिवार जाति, धर्म,क्षेत्र और भाषाओं की दीवार को लांघ चुका है।

इंदिराजी का गरीबी हटाओं का नारा उनके दिल से निकला था शायद इसीलिए लोग उन्हे अभीतक का बेहतरीन प्रधानमंत्री मानते हैं। वो सही मायनों में एक करिशमाई नेता थी।

90 के दशक में देश में जो कम्प्यूटर क्रान्ति आई उसकी पृष्ठभूमि भी इंदिराजी के शासन काल में बनाई गई थी। उनके शासनकाल में ऐसी नीतियां बनाई गई जिस वजह से देश कंप्यूटर के मामले में बाद के दशकों में बड़ी ताकत बनकर उभरा। राजीव गांधी ने इसे और भी आगे बढ़ाया।

इन सब बातों के मद्देनजर देखें तो इंदिरा गांधी को किस तरह मूल्यांकित किया जा सकता है? बहुत से लोग इंदिराजी के शासनकाल में लगाए गये आपातकाल पर आज भी सवाल उठाते हैं लेकिन य़े बात आज भी सच है कि इंदिराजी ने देश को एक बनाए रखने में अहम भूमिका का निर्वाह किया। उन्होने एक ऐसी विदेश और आर्थिक नीति की नींव डाली जो आज भी भारत को 21वीं सदी में सुपर पॉवर बनने की राह में बड़ी मददगार हैं।