Tuesday, November 3, 2009

इंदिरा गांधीः एक मूल्यांकन

पिछले 31 अकटूबर को पूरे देश में इंदिरा गांधी का 25वां शहीदी दिवस मनाया गया और अब माकूल वक्त आ गया है कि हम इंदिरा गांधी का इस देश के प्रति योगदान पर चर्चा करें। आजादी के बाद देश को पंडित नेहरु के रुप में एक दूरदर्शी और आधुनिक नेता मिला जिसकी परंपरा इंदिरा गांधी ने बखूबी आगे बढ़ाया।

इंदिराजी के कार्यों का जिक्र करते समय अक्सर लोग उनके कुछ बड़े कामों जैसे बैंकों, खानों और तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रवीपर्स का उन्मूलन, उनकी ’71 के चुनाव में भारी जीत और गरीबी हटाओ के आह्वान को गिना देते है-लेकिन वाकई इंदिराजी इस सबसे बढ़कर बहुत कुछ थी जिसे यह देश सदियों तक याद रखेगा।

चुनाव सन् 71 के जनवरी हुए थे और उसी साल दिसंबर में इंदिराजी के नेतृत्व में भारत ने पाकिस्तान को लड़ाई में करारी मात दी। बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में पूरी दुनिया के सामने आया। लेकिन इंदिराजी का जो सबसे साहसिक कदम था वो ये कि उन्होने भारत को पहली बार परमाणु शक्ति संपन्न देश की श्रेणी में ला खड़ा किया। एक शक्तिशाली और उदीयमान भारत की धमक दुनिया को सुनाई पड़ने लगी। उनकी ये एक ऐसी उपलब्धि है जिसे उनके विरोधी खासकर बीजेपी के लोग भी मानते हैं। बांग्लादेश मुक्ति के वक्त ये अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिन्होने इंदिराजी को दुर्गा तक कहा था।

इस देश की कई पीढियां इंदिराजी को लेकर अगर नोस्टेल्जिक हैं तो इसकी वजह है। इंदारजी शायद आखिरी नेता थी जिनमें पूरा मुल्क अपना अक्श देखता था। शायद उनकी मौत के बाद से पूरा भारतीय लोकतंत्र एक अखिल भारतीय नेता की तलाश में अभी तक भटक रहा है। यूं, एक सवाल ये भी है कि क्या गठबंधन के इस युग में हम अलग दबाव समूहों, अलग-अलग आकांक्षाओं और सतरंगी पार्टियों के हाथ में देश को सौंप कर सुरक्षित महसूस कर रहे हैं या फिर हमें अभी भी पूरे देश को अपने व्यक्तित्व में समाहित करने वाली एक शख्सियत की तलाश है भले ही उसमें अतिरंजित सत्ता का ही खतरा क्यों न हो। शायद दोनों ही सवाल अहम हैं, और अधूरे भी। लेकिन हिंदुस्तान ने इंदिराजी की शक्ल में एक ऐसा नेता पाया था जो अरसे बाद किसी मुल्क को नसीब होता है।

कुछ राजनीतीक टीकाकारों की राय में इंदिराजी का एक अहम योगदान ये भी था कि 60 से लेकर 80 के दशक तक के उस दौर में उन्होने देश को एक बनाए रखने में सफलता प्राप्त की। खासकर तब जब हमारा पड़ोस अराजकता की वजह से बुरी तरह चरमरा रहा था। पाकिस्तान दो टुकड़ो में बंट चुका था, अफगानिस्तान में सोबियत हस्तक्षेप हो चुका था और श्रीलंका जातीय युद्ध में बुरी तरह उलझा था। ये उस दौर की बातें है जबकि पश्चिम के कई राजनीतिक विश्लेश्कों ने यहां तक दावा कर दिया था कि हिंदुस्तान एक देश के तौर पर ज्यादा दिन तक बजूद नहीं रख पाएगा। उनका कहना था कि या तो देश बिखर जाएगा या फिर सेना यहां की सत्ता पर कब्जा कर लेगी। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, इसे इंदिराजी का बड़ा योगदान माना जा सकता है।

लेकिन इंदिराजी की सबसे बड़ी देन जो है वो विदेशनीति के क्षेत्र में है। उन्होने भारत के चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाकर उस देश को हमेंशा के लिए सुरक्षात्मकर मानसिकता में जीने को मजबूर कर दिया। ये कल्पना करने की बात हो सकती है कि अगर पाकिस्तान आज एक होता तो सीमा के दोनों तरफ से हो रही आतंकी हमलों से हम किस तरह निपटते। कश्मीर जहां अभी तक हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है, इंदिराजी के जमाने में शांत था।

कई लोग आरोप लगाते हैं कि इंदिराजी के दौर में भारत, सोबियत संघ पर कुछ ज्यादा ही निर्भर हो गया। लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो तत्कालीन तेजी से बदलती दुनिया में परिस्थितियों ने ऐसी शक्ल ले ली थी कि भारत के सामने ज्यादा विकल्प नहीं थे। 60 के दशक में ही पाकिस्तान, अमेरिका की गोद में जा चुका था। 70 के दशक में पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका के साथ प्रगाढ़ संबंध बना लिए। 80 के दशक में पाकिस्तान, अफगानिस्तान में सोबियत हस्तक्षेप की वजह से अमेरिका का दुलारा बन चुका था। ऐसी हालत में भारत को सोबियत संघ के साथ दोस्ती करने के अलावा कोई चारा भी नहीं बचा था।

आज पाकिस्तान की अमेरिका पर निर्भरता पूरी दुनिया देख रही है और पाकिस्तान के लिए इसके सुखद परिणाम भी नहीं आए हैं। पाकिस्तान, मलवा में तब्दील होता जा रहा है। शायद हमारी सोबियत संघ से दोस्ती उस हिसाब से बेहतर परिणाम दे गई-हमारी हालत उनसे बहुत अच्छी है।

देश के अंदरुनी हालत की बात की जाए तो देश में हरित क्रान्ति की शुरुआत भले ही लालबहादुर के शासनकाल में हुई थी लेकिन उसे एक मुकम्मल अंजाम तक इंदिराजी के काल में ही पहुंचाया गया। इंदिराजी के शासनकाल में देश ने दो-दो अकाल झेला। जिस वजह से इस योजना में और भी तेजी लाई गई।

राजनीतिक मोर्चे पर इंदिराजी ने महान साहस और धैर्य का परिचय दिया। कांग्रेस के कद्दावर नेताओं-खासकर मोरारजी देसाई, अतुल्य घोष, एस नजिलिंजप्पा, के कामराज सहित कई नेताओं को उन्होने राजनीतिक मैदान में पटखनी दी। इंदिराजी ने अपने शासनकाल में जितना विरोध झेला उतने उनके पिता जवाहरलाल नेहरु ने भी अपने 17 साल के शासनकाल में नहीं झेला। सिर्फ एक बार सन् 62 की लड़ाई में भारत की हार के बाद नेहरु को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा, लेकिन इंदिरा गांधी को तो एक-एक इंच जमीन के लिए लड़ना पड़ा। लेकिन, ये भी उतना ही बड़ा सच है कि हर लड़ाई के बाद वो मजबूत होती गई। दरअसल, वो 1969 के बाद ही मजबूत हो गई थी जब उन्होने प्रिवीपर्स को समाप्त किया था और बैंको का राष्ट्रीय़करण कर दिया था। सन् 71 की लड़ाई में जीत के बाद तो उनका कद देश और विदेशों में भी काफी बढ़ गया।

एक बात और जो इंदिरा गांधी में अहम थी वो ये कि वो उन गिनी चुनी नेताओं में थी जिसकी अपनी एक अखिल भारतीय छवि थी। वो जाति और धर्म से बहुत ऊपर उठ चुकी थी। ये चीज उन्हे पारिवारिक विरासत में मिली थी।

अगर नेहरु परिवार के इतिहास को देखा जाए तो साफ हो जाता है कि खुद मोतीलाल नेहरु, जो गांधीजी से उम्र में बड़े थे, उन्होने आजादी की लड़ाई के लिए अपनी जमी-जमाई वकालत छोड़ दी थी। वे गांधीजी के साथ जा खड़े हुए थे। खुद पंडित नेहरु, बहुत कम उम्र में राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए थे और कई साल तक जेल में भी रहे। नेहरु चाहते तो इन सब चीजों से बच भी सकते थे लेकिन उन्होने वहीं रास्ता अख्तियार किया। नेहरुजी, गांधीजी के बाद देश के सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता साबित हुए-इदिंराजी ने इन सब चीजों को विरासत में पाया था।

जो लोग नेहरु-गांधी परिवार पर वंशवाद का आरोप लगाते हैं वे सही नहीं है। नेहरु-गांधी परिवार का कोई भी सदस्य ऊपर से थोपा नहीं गया था। सभी चुनाव जीतकर आए थे। मोतीलाल नेहरु ’20 के दशक में केंद्रीय एसेंबली के लिए चुने गये थे। नेहरु, इंदिरा,सोनिया और राहुल गांधी सभी चुनाव जीतकर आए हैं। ये सभी एक बड़े वहुमत से चुनाव जीतकर आए हैं इसलिए ये कहना सही नहीं है कि नेहरु-परिवार वंशवाद के तहत देश पर थोपा गया है। दरअसल, य़ह एक अद्भुद खानदान है जिसमें सभी चुनकर आए हैं। यह एक चुना हुआ खानदान है।

अगर देखा जाए तो दुनिया के किसी भी देश में एक ही परिवार की पांच पीढ़िया चुनाव के माध्यम से जीतकर कभी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नहीं रही। इससे साबित होता है कि इस परिवार की अपील पूरे देश में है। नेहरु परिवार जाति, धर्म,क्षेत्र और भाषाओं की दीवार को लांघ चुका है।

इंदिराजी का गरीबी हटाओं का नारा उनके दिल से निकला था शायद इसीलिए लोग उन्हे अभीतक का बेहतरीन प्रधानमंत्री मानते हैं। वो सही मायनों में एक करिशमाई नेता थी।

90 के दशक में देश में जो कम्प्यूटर क्रान्ति आई उसकी पृष्ठभूमि भी इंदिराजी के शासन काल में बनाई गई थी। उनके शासनकाल में ऐसी नीतियां बनाई गई जिस वजह से देश कंप्यूटर के मामले में बाद के दशकों में बड़ी ताकत बनकर उभरा। राजीव गांधी ने इसे और भी आगे बढ़ाया।

इन सब बातों के मद्देनजर देखें तो इंदिरा गांधी को किस तरह मूल्यांकित किया जा सकता है? बहुत से लोग इंदिराजी के शासनकाल में लगाए गये आपातकाल पर आज भी सवाल उठाते हैं लेकिन य़े बात आज भी सच है कि इंदिराजी ने देश को एक बनाए रखने में अहम भूमिका का निर्वाह किया। उन्होने एक ऐसी विदेश और आर्थिक नीति की नींव डाली जो आज भी भारत को 21वीं सदी में सुपर पॉवर बनने की राह में बड़ी मददगार हैं।

No comments:

Post a Comment