कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी देश और दुनिया की अहम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। चाहे वो मसला जंगल से जुड़ा हो या आदिवासियों से। आदिवासी मुद्दों, औद्योगिकीकरण और खनिजों की खुदाई जैसे मुद्दों पर उनकी एक स्पष्ट सोच है जो कांग्रेस के आमआदमी के नारे के बिल्कुल अनुरुप है। तकरीबन साल भर पहले एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होने कहा था कि वे औद्योंकिकरण और माईनिंग के खिलाफ नहीं है लेकिन ऐसा करते समय ये देखा जाना चाहिए कि आमआदमी का हित प्रभावित न हो। उन्होने कहा, ‘मैं औद्योगिकीकरण के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मैं ऐसी जगहों पर खनिजों की खुदाई के बिल्कुल खिलाफ हूं जो लोगों की जिंदगी को प्रभावित करे। अगर खुदाई से लोगों की संस्कृति, उनकी जीवनशैली, वहां का पर्यापरण और पीने के पानी की आपूर्ति वाधित होती है तो ऐसा नहीं होना चाहिए। उनकी खेती, उनका शिकार और उनके द्वारा जंगल से फल और लकड़िया इकट्ठा करना प्रभावित नहीं होना चाहिए। ये मेरा निजी विचार है’।
उनका मानना है कि देश के कई सूबों में खनिजों की भरमार है लेकिन लोग गरीब हैं। वहां की सरकार के पास भी पैसे की कोई कमी नहीं है लेकिन लोगों के पास तरक्की का फायदा नहीं पहुंच पा रहा। सूबों में कई कल कारखाने भी हैं और सरकारों के पास पैसे की भी कमी नहीं है। कल कारखानों के विकास में इन आदिवासियों और दलितों का खून पसीना लगा है लेकिन अभी तक उन्हे इसका उचित हिस्सा नहीं मिल पाया है। उनका ये भी मानना है कि अगर सूबों का सही तरीके से विकास करना है तो इन कारखानों और उद्योगों को सामने आना होगा और लोगों का हाथ थामना होगा। उनकी तरक्की में हाथ बंटाना होगा।
जाहिर है, कांग्रेस महासचिव की सोच, पार्टी के उसी सिद्धांत का एक हिस्सा है जो वकालत करती है कि देश में विकास का एक समन्वयकारी माडेल तैयार किया जाए। जहां सभीलोगों को तरक्की करने का बराबर मौका मिले।
कमजोरों का हाथ थामे सरकार
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का मानना है कि विकास और गरीबों के हित के बीच एक तालमेल होनी ही चाहिए। उनका साफ मानना है कि विकास की योजनाओं से सबसे ज्यादा अगर कोई प्रभावित होता है तो वो गरीब है-इसलिए हमारी चिंता का केंद्र गरीब होना चाहिए। अगर सरकारें समझादारी से काम ले तो इस संतुलन को कायम किया जा सकता है। लेकिन कई जगह जब ऐसा नहीं होता है तो सिंगूर और नंदीग्राम जैसे हालात पनपते हैं। वे आगाह करते हैं कि आनेवाले दिनों में अगर इस बात का ख्याल नहीं रखा गया तो ये समस्याएं और भी सामने आएंगी क्योंकि उसी अनुपात में विकास कार्यों से प्रभावित होनेवाले लोगों की तादाद भी बढ़ेगी।
उनका साफ मानना है कि अगर कोई सरकार संवेदनशील है तो वह ऐसी हालत में आगे बढ़कर गरीबों का हाथ थामेगी और उनके लिए उचित उपाय करेगी। अपने उड़ीसा दौरे का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि ऐसे ही एक गांव में उन्होने एक ही जैसे छोटे-छोटे पक्के मकान देखे और लोगों से पूछा कि ये क्या है। लोगों ने कहा कि पहले वे वहां से 30-40 किलोमीटर दूर रहते थे लेकिन अब उद्योंगों और खुदाई की वजह से उन्हे वहां से हटाकर ये मकान आवंटित कर दिए गए हैं। वहां न तो कोई बिजली का इंतजाम था न ही कोई स्कूल था। कहने का मतलब ये कि ये वो लोग थे जो विकास की गतिविधियों से प्रभावित हुए थे। इसे रोकना ही होगा, नहीं तो असंतोष को रोका नहीं जा सकता।
जाहिर है, ये एक ऐसे नेता की सोच है तो विचार और व्यवहार से इंसानियतपसंद है। जो व्यावहारिक बातें करता है और भविष्य की सोच रखता है।
नक्सलिज्म को रोकने के लिए सरकारों को जनता तक जाना होगा
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का मानना है कि नक्सलिज्म सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। बल्कि ये सरकारी योजनाओं का जनता तक सही तरीके से न पहुंच पाने और भ्रष्टाचार का मामला है। एक प्रेसवार्ता में उन्होने स्पष्ट कहा कि, ‘नक्सलिज्म को दो तरीकों से देखा जाना चाहिए। इसके दो पहलू है। एक जैसा मैने पहले भी दुहराया है-कुछ राज्यों में वहां की सरकार आम जनता तक नहीं पहुंच पा रही है और उनकी समस्या को नहीं सुन रही है। दूसरा ये कि चूंकि सरकार जनता की बात नहीं सुन रही है, यह एक कानून-व्यवस्था का मसला बनता जा रहा है। तो अगर आप मेरी राय में नक्सलिज्म की व्याख्या सुनना चाहते हैं तो हमें ये सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी योजनाएं जनता तक सही तरीके से पहुंचे और उन्हे इसका फायदा हो। जिस दिन ऐसा होने लगेगा, नक्सलिज्म अपने आप खत्म हो जाएगा’।
आमलोगों से मिलने की उनकी मुहिम सियासतदानों के लिए एक नजीर है....
राहुल गांधी देश की जनता का नब्ज जानना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों से वे मिलें और उनकी समस्याएं समझें। अपने कई दौरों में राहुल गांधी ने इसके लिए आदिवासी युवाओं से बंद कमरे में मुलाकात की और उनकी तकलीफें सुनीं। अपने हालिया झारखंड दौरे में उन्होने साहिबगंज में सैकड़ों आदिवासी युवाओं से बात की और उनकी समस्याओं और आकांक्षाओं को जानने की कोशिश की। उन्होने संथालपरगना का इतिहास, आदिवासी आंदोलन, आजादी की लड़ाई में उनके बलिदान और उनके भविष्य के बारे में उनसे गहन चर्चा की। वे आदिवासी संस्कृति को जानना चाहते हैं और कई बार कह चुके हैं कि ऐसा इसलिए जरुरी है कि अलग-अलग जगह के हालातों के अनुरुप योजनाएं बनाई जा सकें।
कांग्रेस महासचिव का ये प्रयास आज के सियासतदानों के लिए एक नजीर है। वे मानते हैं कि आमलोगों की सरकार तभी सही तरीके से काम कर पाएगी जब वो अलग-अलग संस्कृति के लोगों की समस्याओं को सही तरीके से हल करने की कोशिश करेगी।
आदिवासियों, दलितों की नुमांइदगी पर यूथ कांग्रेस का खास जोर
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का ये मानना है कि देश की तरक्की तब तक नहीं हो सकती जब तक समाज के कमजोर तबकों को उचित मौका नहीं मिलता। एक सवाल के जवाब में उन्होने कहा था कि उनका संगठन यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई- जिसके कि वे प्रभारी है- ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ रहा है जिसमें आदिवासी और दूसरे कमजोर तबकों को ज्यादा से ज्यादा नुमांइदगी हासिल हो। यूथ कांग्रेस में आदिवासियों और दलितों के लिए जरुरी तादाद में सीटें रिजर्व हैं और उनकी यहां उनकी नुमांईदगी खासतौर से सुनिश्चित की गई है। उनकी अवहेलना यहां विल्कुल मुमकिन नहीं है। कई जगह तो ऐसा भी हुआ है जहां संगठन के चुनावों में आदिवासियों ने बड़ी तादाद में सीटें हासिल की है। इससे कई दफा दूसरे तबके के लोगों को ताज्जुब भी होता है, लेकिन यूथ कांग्रेस का ढ़ांचा इस हिसाब से तैयार किया गया है कि ये कमजोर तबकों के प्रति थोड़ा सा पक्षपाती है। यह एक तरह से सकारात्मक पक्षपात है।
हजारों सालों से जंगलों में रहने वाले पर्यावरण के दुश्मन नहीं
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का मानना है कि जो लोग हजारों सालों से जंगलों में रहते हैं वे जंगल के दुश्मन कैसे हो सकते हैं। उनका मानना है कि आदिवासी जंगल और पर्यावरण के असली दोस्त है। ये कहना कि उनकी जीवनशैली जंगल को नुक्सान पहुंचा रही है, बिल्कुल गलत है। उनका ये भी मानना है कि समाज का एक तबका पर्यावरण को बचाने और उसे संवर्द्धित करने में आदिवासियों के पीढ़ियों के ज्ञान और अनुभव को नजरअंदाज कर रहा है। अगर हम ऐसा करते रहे तो हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। उनका साफ मानना है कि आदिवासियों का हजारों साल का संचित अनुभव हमें पर्यावरण को बचाने में बड़ी मदद कर सकता है।
जब यूपीए सरकार ने संसद में जंगल अधिकार कानून पास किया तो कांग्रेस महासचिव और पार्टी की यहीं सोच झलक कर सामने आई। वे बहुत दिनों से इसकी वकालत करते रहे हैं। आखिरकार सरकार ने ये कानून बनाकर जंगल में रहनेवाले समुदायों का उनके जंगल की संपदा पर कुदरती अधिकार को कानूनी मान्यता दे दी।
Wednesday, November 11, 2009
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