गुरुवार की सुबह उठते ही राहुल ने हैंडपंप पर मुंहहाथ धोया और खेतों की ओर निकल गए। राहुल गांधी ने देखा कि देश की जनता किस तरह अपने पेयजल की जरुरतों को पूरा करती है। जिस देश में कागजों पर भले ही पेयजल योजनाएं कामयाब दिखती हो लेकिन दूरदराज के गांवों में अभी भी पीने का पानी हैंडपंप से ही आता है। कई सरकारी, गैरसरकारी रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि बीमारियों की सबसे बड़ी वजह प्रदूषित पानी ही है। ऐसे में राहुल ने इस बात को व्यक्तिगत रुप से अनुभव की ठानी।
राहुल गांधी खेतों में गए और नरेगा के तहत बने सड़कों का हाल देखा। जिस देश के सियासतदानों का एक बड़ा वर्ग गांव से ताल्लुक रखने पर भी गांवों को भूल जाता हो, ऐसे मुल्क में राहुल गांधी जैसे नेता का खेतों में घूमना अपने आप में बड़ी बात है। भ्रष्टाचारियों की जमात में शुमार बड़े-2 नेता गांव की पृष्ठभूमि से आते हैं लेकिन वे कभी गांव-देहात की सुध नहीं लेते। उनकी जुबान से खेती और गरीबों की तकलीफ का जिक्र नहीं होता। वे शहरी रंग में रंग जाते हैं और उनका रातोंरात रुपान्तरण हो जाता है।
लेकिन राहुल गांधी ने इस मिथ को झुठलाने की कोशिश की है। उन्होने एक नई परंपरा की शुरुआत की है। उनका खेतों में जाना और गांव के हैंडपंप पर नहाना अपने आप में एक प्रतीकात्मक महत्व रखता है। ये बताता है कि आनेवाले हिंदुस्तान में इन चीजों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अगर इस मुल्क को आगे बढ़ना है तो खेती में तरक्की लानी होगी, गांवों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति करनी होगी और बिजली का इंतजाम करना पडेगा। शायद राहुल गांधी के इस दौरे का यहीं सही संदेश है-इस देश की सियासी पार्टियों के लिए भी और सत्ता संस्थानों के लिए भी।
Friday, September 25, 2009
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