बुधवार को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के यूपी दौरे से कई लोग अचंभित हैं। एक तरफ उनके विरोधी इसे सस्ती लोकप्रियता करार दे रहे हैं तो दूसरी तरफ यूपी के कांग्रिसियों का मानना है कि ये जरुरी नहीं कि हर दौरे की सूचना सब को दी ही जाए। लेकिन राहुल गांधी के इस दौरे ने जिस सवाल को आगे बढ़ाया है वो ये है कि क्या आज के दौर में राजनीतिज्ञ सादगी से नहीं जी सकते ? क्या नेताओं की पहचान सिर्फ लालबत्ती लगी एसी गाड़िया और ग्लैमरस जीवनशैली ही रह गई है? राहुल पहले भी कह चुके हैं कि इस देश के नेता, आम जनता से कटते जा रहे हैं और दोनों की सोच में खाई बढ़ती जा रही है। ऐसे में जनता की नुमांइदगी का दावा करने वाले नेता, उस जनता जनार्दन का दर्द कैसे समझ सकते हैं जिसने उन्हे चुनकर लोकसभा और विधानसभाओं की खूबसूरत इमारतों में भेजा है।
राहुल गांधी, बुधवार की रात जब श्रावस्ती के तेल्हार गांव में एक दलित के घर खुले में मच्छरदानी लगाकर सोते हैं तो उनकी यहीं भावना सामने आती है। खबरों के मुताबिक राहुल को जब नींद नहीं आई तो उन्होने मच्छरदानी हटवा दी खुले में सोए। गौरतलब है कि ये वहीं इलाका है जहां एंसेफलाईटिस का सबसे ज्यादा प्रकोप है और राहुल ने बकायदा व्यक्तिगत रुप से इसको समझने की कोशिश की। इस बीमारी से इस इलाके में इस साल कम से कम 1000 से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं और अब तक 200 से ज्यादी की मौत हो चुकी है। ये बीमारी मच्छरों के काटने और प्रदूषित पानी पीने से होता है। राज्य सरकार इस बीमारी से निपटने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।
जाहिर है, कांग्रेस महासचिव का ये दौरा इस बात को समझने की सीधी कोशिश थी कि जनता को किस तरह के हालातों में जीवन गुजारना पड़ता है। यह दौरा एक परिपक्व होते नेता की इमानदार पहल थी जिसे देश के सत्ता संस्थानों को भी समझना है और उस हिसाब से नीतियां बनानी है। राहुल ने देखा कि गांव में बिजली का नामोनिशान नहीं है। उन्होने महसूस किया कि जिस देश के नेता एक दिन में हजारों रुपये की बिजली का उपभोग कर लेते हैं, उतनी बिजली में कितनी आसानी से एक पूरे गांव को रोशन किया जा सकता है। और शायद राहुल गांधी के दौरे का यहीं सबसे ठोस अनुभव और संदेश था।
Friday, September 25, 2009
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