Friday, September 25, 2009

आम जनता से सीधा संवाद और हम कीमत पर नियमों का पालन

राहुल गांधी जहां भी गए उन्होने लोगों से सीधा संवाद किया। उन्होने पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने इस दौरे से दूर रखा। उन्होने लोगों से पूछा कि नरेगा का काम ठीक से चल रहा है या नहीं। उन्होने जनवितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले अनाज के बारे में लोगों से पूछताछ की। बाढ़ से होनेवाली उनकी तकलीफों का जायजा लिया। कांग्रेस महासचिव ने लोगों से पूछा कि क्या उनके सांसदों और जनप्रतिनिधियों से उन्हे मदद मिल पा रही है? उन्होने लोगों से उन कांग्रेस कार्यकर्ताओं का नाम तक पूछ लिया जिन्होने बाढ़ के वक्त लोगों की मदद की थी। जाहिर है, उनके इस दौरे से पार्टी के नेता और सांसद ज्यादा चौकन्ने और जनसेवा के प्रति समर्पित होंगे।

हलांकि यह बात प्रसंग से हटकर लग सकती है लेकिन राहुल गांधी ने गांवों का दौरा करके उस सनातन भारतीय परंपरा को दुहराने की कोशिश की है जब प्रजावत्सल राजा अपनी जनता का हाल जानने वेष बदल कर राज्य का दौरा करते थे। लोकतंत्र में राजनेता आज अपना ये कर्तव्य भूलते जा रहे हैं। राहुल गांधी ने जनता से संवाद कर इस परंपरा को जिंदा किया है। उन्होने जनता और नेता के बीच की खाई को पाटने की कोशिश की है-भले ही विरोधी इसे सस्ती लोकप्रियता की नौटंकी करार दें।

राहुल गांधी ने सड़क किनारे एक दुकान में जलेबी भी खाई। वे इस बात का अनुभव करना चाहते हैं कि आम जनता कैसे सोचती है और कैसे व्यवहार करती है। वे इस बात को महसूस कर रहे थे कि इस देश के सत्ता प्रतिष्ठानों में बैठने वाले लोगों का नाता इस देश की जनता से पूरी तरह टूट चुक है, जो सरकारी नीतियों और उसके क्रियान्वयनों में साफ झलकता है।

कांग्रेस महासचिव ने एक जगह सड़क पर लगने वाली चुंगी भी अदा की। खबरों के मुताबिक जब चुंगी बसूल करने वाले कर्मचारी को पता चला कि ये राहुल गांधी हैं तो उसे बड़ा अफसोस हुआ। लेकिन राहुल गांधी नियम-कायदों के पक्के हैं। वे अपने आप को आम नेताओं के उलट इस देश की आम जनता से ऊपर नहीं मानते। वे अपने आपको जनता का एक हिस्सा मानते हैं।

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